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Hindi Poems | Hindi Poetry | Hindi Kavita | हिन्दी कविताओं का संग्रह

इस संकलन में श्रेष्ठ सामाजिक कविताएँ  प्रकाशित की गई है।  मैंने  सामाजिक मुद्दें जैसे – देश की समस्याएं, समाजिक उत्पीड़न  और ज्वलंत मुद्दों पर कविताओं का संग्रह किया गया हैं।




Poem On The Problem Inside The Country

देश अमीर है लोग गरीब है
भूगोल विशाल है सोच छोटी है

भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट प्रशासन, लचर कानून हैं
संविधान सेकुलर है, लोग जातिवादी है

संस्कृति पुराणी है, ग्रन्थ पुराणा है
लोग अनपढ़ है, समझ सीमित है

देश के संपदा पर गर्व है, फिर भी शर्म है
कुरीतियों का बोल है, लोग बेशर्म है

वो रेपिस्ट है, उसका ही आतंक है
माँ- बाप को डर है, लोगों का एम एम एस पर नज़र हैं

बदतमीज़ी बचपन की आदत है, बड़ों से दुर्व्यवहार है
बाप वृद्ध आश्रम में, माँ घर का काम करके बीमार है

सेना है, शहादत है, सीमा सुरक्षित है, देश को गर्व हैं
आंतरिक धरोहर ख़तरें में है, लोग इसके दुश्मन हैं

देश आज़ाद है लोग ग़ुलाम है
लोकतंत्र है, संविधान है

समस्याएं है, समाधान है
अतीत से भविष्य तक, हमारा देश महान है!

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देश अमीर है लोग गरीब है।

Poem About Dirty Politics

प्यार से रहने की आदत है हमारी 
इसका मतलब ये नही
की हम नफ़रत नही कर सकते है

तुम्हारी भलाई इसी में है
की अब तुम भी प्यार करो 
वरना, हिसाब बराबर हम भी कर सकते है

मज़हब का हवाला देकर गुंडा गर्दी बंद करो
वरना, गुंडा गर्दी हम भी कर सकते है

कब तक फैलाओगे सियासत की चिंगारी लोगों में
ठहर जा, सियासत में चिंगारी हम भी लगा सकते है

गरीबों का निवाला घोटने वाले घोटालेबाज
तेरे हिस्सें का निवाला हम भी घोट सकते है

प्यार से रहने की आदत है हमारी 
इसका मतलब ये नही 
की हम नफ़रत नही कर सकते है

तुम्हारी भलाई इसी में है
की अब तुम भी प्यार करो
वरना, हिसाब बराबर हम भी कर सकते है।

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प्यार से रहने की आदत है हमारी

Poem About Bad Time

दादा कहते है ज़माना बदल रहा है
ज़माना बदल गया है
वो लोग नहीं रहे अब
वो भाईचारा बदल गया है

जिस खंजर से पहले दुश्मन मारते थे
वो खंजर अब
अपनों के हाथों में पाया गया है

देख ज़माना
बूढ़े माँ- बाप को बेटा अपंग कहता है
घर से निकाल कर उन्हें
वृद्ध आश्रम पहुँचाया गया है

क़ातिल बन गये है सब के सब
खून बहाया जा रहा है
अपने ही घरों में अपनों को मारा गया है

बचा नहीं और कुछ होने को
इस ज़माने में
ए ज़माना बस कर
इंसान को हैवान बनाया गया है।

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ज़माना बदल रहा है ज़माना बदल गया है।

Poem About Terrorist

तुम जिन्दा हो
ये तेरा वजूद है
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

मारते हो लिटाते हो
जलाते हो मिटाते हो
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

ये इंसान, जानवर, कीड़ें- मकोड़ें
जो डरते है तुमसे
मर जाओं 
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

जमीं, आसमां, बादल, पर्वत
सभी कहते हैं 
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

बूंद, झड़ना, नदी, समन्दर
सभी डुबाना चाहते है तुम्हे 45
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

ख़ुदगर्ज़, बेईमान, चोर, अपराधी
सभी बोलते हैं 
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हर मज़हब भाई- भाई
सभी तुम्हे मिटाना चाहते हैं

दुश्मन तुम हो जिसके
वो सभी दोस्त है
मर जाओं
तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है।

 

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तुमसे किसी को फ़र्क पड़ता है।



सूचना:- ये सभी कविताएं लेखक नवीन कुमार नीरज की काव्य- संग्रह “शीशे की दीवार” से ली गई हैं जो किताब के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं। आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि चाणक्य न्यूज़ को इसी तरह से अपना प्यार देते रहिए और अगर कोई सुझाव देना चाहते है तो हमे कमेंट में बताइए। इन कविताओं से अगर किसी के ठेस पहँचती है तो हमे खेद हैं।आपके प्यार के लिए आप सभी को दिल से धन्यवाद!

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