Tuesday, June 2, 2020
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Jyotiba phule : महिलाओं के लिए खोला था पहला स्कूल, महात्मा फूले का जीवनी

ज्योतिबा फुले महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। समाज मे दबे कुचले लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया।

ज्योतिबा फुले महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। 19वी सदी में समाज में फैली कई तरह के कुरीतियों को उन्होंने उखार फैका और हिन्दू समाज में समरसता कायम की। समाज में हाशिए पर पड़े हुए लोगों के उत्थान के लिए वंचितो और शोषितों के लिए उन्होंने कई सराहनिय कार्य किए। ज्योतिबा फुले  के प्रयास से ही समाज मे दबे कुचले लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिली।





ज्योतिबा फुले को महात्मा की उपाधी तब दी गई जब उन्होंने जातिप्रथा का विरोध करते हुए प्रार्थना समाज की स्थापना की। उनका पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। बचपन से ही उन्हे जातिगत भेद भाव के दंस झेलने पड़े। 11 अप्रैल 1827 को पूणे में जन्मे महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले 7 साल की उम्र में स्कूल पढ़ने गए। जातिगत भेद भाव के वजह से उन्हे स्कूल छोड़ना पड़ा। उसके बाद उन्होंने घर पर रह कर पढ़ाई पूरी की। महज 13 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सावित्रीबाई से हो गया। इसी दौरान महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार आंदोलन शुरू हुआ। ज्योतिबा फुले इस आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और प्रार्थना समाज की स्थापना की। इसके प्रमुख गोविंद रानाडे और आरजी भंडारकर थे।

अन्य सराहनीय कार्य

19वी सदी में जातिगत भेद भाव के साथ लिंग के आधार पर भी भेद भाव चरम पर था। तब महात्मा फुले ने 21 वर्ष का उम्र में महिलाओं के लिए देश के पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी। इतना ही नही, जब उस स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक तैयार नही हुए तो उन्होंने अपनी पत्नी को इसके लिए तैयार किया। इस तरह उनकी पत्नी सावित्री बाई फूले देश की पहली महिला शिक्षिका बनी। इसके बाद सावित्री बाई ने तीन अन्य स्कूल खोले। वर्ष 1873 में उन्होंने दलितों के मदद के लिए ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की। वे बाल-विवाह और विधवा-विवाह के कट्टर समर्थक थे। इसलिए उन्होंने 1854 में उच्च वर्ग की विधवाओं के लिए एक विधवाघर भी निर्माण कराया और समाज में लोगों को जागरूक करने के लिए कई पुस्तके लिखी। जैसे- छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा और किसान का कोड़ा इत्यादि।

विधवा के बेटे को लिया था गोद

महान ज्योतिबा फुले और सावित्रिबाई का अपना कोई औलाद नहीं थी। उन्होंने एक विधवा के बच्चे को गोद लिया, पढ़ाया लिखाया, समाजसेवा के कामों में आगे बढ़ाया और आगे जाकर लोगों के कल्याण के लिए वह डॉक्टर बना। 28 नवम्बर 1890 को लकवे के अटैक के कारण समाज को नई दिशा देने वाले महान आत्मा का निधन हो गया। समाज आज भी उनके किए गए कार्य के लिए रीणि है, और उनके बताए गए मार्गों पर चलकर आगे बढ़ रहा है।




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