Tuesday, February 18, 2020
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Kaifi Azmi Famous Shayar: शायर कैफी आज़मी की जीवनी

कैफ़ी आज़मी उर्दू के एक अज़ीम शायर थे। उन्होंने बॉलिवुड में कई प्रसिद्ध गीत व ग़ज़लें भी लिखीं।

उर्दू के बेहतरीन शायर कैफी आज़मी (kaifi Azmi) का 121वी जयंती है। प्रेम- मोहब्बत पर कविताएं व नज़में लिखने वाले कैफी आज़मी फिल्मों में लाजवाब गीत और कमाल का पटकथा लेखन भी किया। 20वी सदी के महान कवियों में कैफी आज़मी का नाम आता था। उन्हे बचपन से कविताएं पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी थी। महज 11 साल की उम्र में उन्होंने पहली कविता लिख डाली थी। आगे जानिए उनके जीवन से जुड़े सभी तथ्य।


जीवन परिचय

कैफी आज़मी का जन्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को हुआ था। उनका असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था।  घर में शिक्षा- साहित्य और शेरों शायरी का माहौल था। यही कारण है कि उनमे लेखन प्रतिभा बचपन से विधमान थी। लिखने का शौक इतना था कि वे कविता लिखकर आस-पड़ोस में होने वाले मुशायरों में हिस्सा लेते और लोगों को अपनी कविता सुनाते थे। कैफी आज़मी जब 23 साल के हुए तो महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से काफी प्रभावित हुए। ये बात उनकी लेखनी में साफ साफ देखा जा सकता है।

कैफी आज़मी का सफर

साल 1923 में कैफी आज़मी बम्बई (मुंबई) आ गए। जहाँ उन्हे आर्थिक तंगियों का सामना करना पड़ा। तब कैफी आज़मी ने कविताओं के अलावा फ़िल्मों के लिए गीत लिखने शुरू कर दिए। पहली फिल्म ‘बुज़दिल’ में उन्होंने दो गाने लिखें। उसके बाद फिल्मों में उनकी प्रसिद्धी बढ़ती गई। बाद में उन्होंने कई फिल्मों के स्क्रिप्ट भी लिखे। जैसे- हक़ीक़त, काग़ज़ के फूल, हीर राँझा’ इत्यादि।

पुरस्कार

अपने कलम से सच को प्रदर्शित करने वाले कैफ़ी आज़मी को कई अवार्ड्स से नवाजा गया। साहित्य और शिक्षा के लिए भारत का प्रतिष्ठित अवार्ड पद्म श्री दिया गया था। इसके अलावा उन्हे 3 बार फिल्म फेयर और साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप भी दिया गया था।

जब औरत पर लिखी कविता

अपनी लेखनी में सामाजिक न्याय और समानता को तरजीह देने वाले शायर कैफी आज़मी ने एक कविता लिखी थी, जिसका शीर्षक ‘औरत’ था। यह कविता महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिखी थी। जिसे समाजिक तौर पर काफी पसंद किया गया था। वो कविता नीचे दिए जा रहे हैं। आप उस कविता को ज़रूर पढ़िए-


कविता ‘औरत’

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
कल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज

हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज
आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज

हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज
जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार

तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार
तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार

ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ’य्युन का हिसार
कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है

तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है
ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं

नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं

जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए

फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए

ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझ में शो’ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल

ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल

क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़

तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़
तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़

तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तू फ़लातून अरस्तू है तू ज़हरा परवीं

तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

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