Saturday, July 11, 2020
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Poetry: इश़्क पर 5 बेहतरीन कविताएं

इश़्क पर 5 सबसे बेहतरीन हिन्दुस्तानी कविताएं

इश़्क पर पाँच सबसे बेहतरीन कविताएं आपके लिए लाया हूँ। ये सभी कविताएं इश़्क की अलग- अलग पहलुओं से एक साथ भेंट कराती है। तो देर किस बात की, पेश है आप सभी के बीच हिन्दुस्तानी कविताएं।


इश़्क है क्या?

इश़्क समंदर की लहरें, हिलकोरें और गहराई सी हैं
जिसे पार किए तो कामयाबी, डूब गए तो बेवफ़ाई भी है

इश़्क हवा की चाल, आँधी और तूफ़ान की रफ़्तार सी हैं
जिसमे चल पड़े तो मिलन, रूक गए तो जुदाई भी सी हैं

इश़्क आकर्षण, खूबसूरत नाजुक फूल सी हैं
जिसके नज़दीक जाओ तो जन्नत, दूर जाओ तो तन्हाई भी है

इश़्क आस्था, पूजा और भगवान सी हैं
जिसे कल्पना करो तो हक़ीकत, खुली आँखों से देखो तो परछाई भी है

इश़्क काग़ज़, पेंसिल और किताब सी हैं
जिसे पढ़ो तो लगे अपनी प्रेम कहानी, ना पढ़ो तो पराई भी है



इश़्क की छाया

जब भी तेरी छाया
मेरी नज़रों से गुज़रती है
पल में पहचान जाता हूँ
की कोई तो रिश्ता है

जो आज भी मेरा पीछा करती हैं

वो और बात है हम कभी मिले नही
वो और बात है हम कभी जुड़े नही
लेकिन, दिल के किसी कोने में
आज भी तेरा बसेरा हैं

हर जगह तेरी पहरा हैं

कहीं भी कभी भी
रोज़ सपने में आती है

नही जानता ये सपना है या हक़ीकत,
मगर, कुछ तो है हमारे बीच
जो रोज़ सुबह मुझे जगाती है

इश़्क की तलाश में

इश़्क की तलाश में निकले तो थे 
मगर मोड़ पर रास्ते कई मिलें
इसलिए थोड़ा घबरा गया
मगर चलना तो था ही
इसलिए एक से गुज़रा
लेकिन वो मिली नहीं

अब क्या था?
सर पकड़कर बैठ गया
लेकिन कब तक बैठता
बैठे बैठे जाँघ और रीढ़ में दर्द होने लगी
इसलिए उठ खड़ा हुआ
अब चलने लगा कोई और रास्ते

थोड़ी दूर चला
वो दिखाई देने लगी
क़रीब गया तो क्या हुआ? 
सच बताऊ;
वो भी मेरा इन्तज़ार कर रही थी
मुझे देखते उसने गले लगा लिया



इश़्क में पैसे

जब तू मेरी प्रेमिका थी
मैं हमेशा तुमसे यही पुछता था
तुम्हे पैसा चाहिए या प्यार 
तू कहती थी `प्यार`
मैं पैसें के पीछे भागना छोड़ दिया
और हर वक़्त तुम्हे प्यार करने लगा
लेकिन, जब शादी करने की बारी आई
तो तुम मुझे छोड़कर चली गई
क्योंकि मेरे पास प्यार तो था, मगर`पैसा` नही
हक़ीकत ये हैं कि इस वक़्त
मेरे पास दोनों ही नही हैं

ना पैसा, ना प्यार
सिवाये बर्बादी के

इश़्क की वो फटी आंचल  

कोई तो रोक लो, मुसाफ़िर हूँ तेरा 
बीते बचपन इधर ही कहीं बिताए थे

पक्का मकान छोड़ आया हूँ
मिट्टी के मकान में रहने 
याद आती है माँ, ढ़ूंढ़ रहा हूँ
इधर ही रूठ कर कल गए थें

आज बहुत कमाये पैसें, ख़र्च कैसे करे 
कल माँ की फटी मैली आंचल में सोये थे

दुनिया डराती है मुखौटें पहनकर 
माँ शक्ल बनाती तो खिलखिलाकर हँसते थे

माँ ने हर बार पहचाना मुझको 
जब भी मुख पर कालिख़ पोतकर गये

ख़बर पड़ोसी से माँ की पूछ लेते
मुझे बचपन में सब पहचानते थे
शक्ल क्या बदली सब मुझे ही भूल गये

कोई तो रोक लो, मुसाफ़िर हूँ तेरा 
बीते बचपन इधर ही कहीं बिताए थे

सूचना:- ये सभी कविताएं लेखक नवीन कुमार नीरज की काव्य- संग्रह “शीशे की दीवार” से ली गई हैं जो किताब के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं। आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि चाणक्य न्यूज़ को इसी तरह से अपना प्यार देते रहिए और अगर कोई सुझाव देना चाहते है तो हमे कमेंट में बताइए। आप सभी को दिल से धन्यवाद!

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