Saturday, September 26, 2020
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विवेकानंद का जीवन-दर्शन और उनके संदेश । Vivekenanda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद का निधन महज 39 साल की उम्र में हो गया था। इतने कम समय में जो उन्होंने कार्य किया वो अकल्पनीय और अविश्वसनीय है। खासकर हमारे जैसे युवाओं के लिए, अगर आप युवा है तो आपको स्वामी विवेकानंद के बारे में ज़रूर जानना चाहिए।




स्वामी विवेकानंद सदियों से हर भारतीय युवा के लिए आदर्श रहे हैं। 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की 157 वीं जयंती है, जिसे भारत में ‘युवा दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। विवेकानंद बचपन से जिज्ञासु और एक विशेष प्रतिभा के धनी थे। उनका आदर्श विचार और शक्तिशाली व्यक्तित्व आज भी दुनिया को प्रेरित करती है। विवेकानंद का निधन महज 39 साल की उम्र में हो गया था। इतने कम समय में जो उन्होंने कार्य किया वो अकल्पनीय और अविश्वसनीय है। खासकर हमारे जैसे युवाओं के लिए, अगर आप युवा है तो आपको स्वामी विवेकानंद के बारे में ज़रूर जानना चाहिए।

जीवन परिचय

सन्यास धारण करने से पहले स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्र दत्त था। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (कोलकाता) में सरल स्वभाव की माता भुवनेश्वरी दत्त के आंचल में हुआ। पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत करते थे। वे विचारक, अति उद्दार, समाजिक और व्यवहारिक व्यक्ति थे। यही कारण है कि बाल नरेंद्र पर बचपन से माता-पिता का प्रभाव पड़ा था।

शिक्षा

नरेंद्र बचपन से तीव्र बुद्धि और ज्ञानी स्वभाव के थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविधालय से स्नातक किया। इसके बाद कानून की पढ़ाई करने लगे। तभी धार्मिक और आध्यात्मिक से जुड़े कुछ सवाल नरेंद्र के ज़हन में आने शुरू हुए, जिसे जानने के लिए उन्होंने अनेक लोगों से मिलना शुरू किया। लेकिन कोई फायदा नही हुआ।

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात

एक दिन नरेंद्र की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई। नरेंद्र उनसे काफी प्रभावित हुए, जिसके बाद उन्होंने सदा के लिए रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरू बना लिया। इसके बाद नरेंद्र के अंदर जन्म ले रहे सारे प्रश्नों का उत्तर मिलता चला गया और एक महान विद्वान के रूप मे नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बन गए।



जब भारत के प्रतिनिधि के तौर पर अमेरिका गए

स्वामी विवेकानंद अब आध्यात्मिक गुरू बन चुके थे। 25 वर्ष के उम्र वे उन्होंने गेरूवा वस्त्र धारण कर लिया। इस दौरान उन्होंने भारतवर्ष का यात्रा किया। साल 1893 में अमेरिका के शिकागो में दुनियाभर के धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि के तौर पर गए। तब यूरोप अमेरिका वाले भारतवासियों को हीन दृष्टी से देखते थे। इसीलिए स्वामी विवेकानंद को भी उनकी हीनता मनोग्रंथि को झेलना पड़ा। वहाँ मौजूद सभी लोग स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए मंच ही नही देना चाहते थे, लेकिन एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। स्वामी जी जैसे ही मंच पर गए और लोगों को संबोधित करते हुए कहा- ‘अमरीकी भाइयों और बहनों’ इतना सुनते वहाँ मौजूद सभी लोगों ने एक शुर में तालियाँ बजाने लगे।

शिकागो में दिए गए प्रभावशाली भाषण

स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा- ‘आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया। उससे मेरा दिल भर आया है। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ से आपको धन्यवाद देता हूँ। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ।‘ स्वामी जी का भाषण काफी लंबा था, लेकिन उसे सुनने के बाद दुनिया ने अपनी हीनता मनोग्रंथि को भारत के लिए सदा के लिए मिटा दिया।

निधन

अमेरिका में स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की कई शाखाएं स्थापित कीं। कई अमेरिकन विद्वान उनके शिष्य बने। स्वामीजी हमेशा खूद को गरीबों का सेवक बताते थे। लेकिन एक दिन वो मनहुस घड़ी आ ही गई, जब भारत के गौरव, महान और शक्तिशाली व्यक्ति का अंत हो गया। 4 जुलाई सन्‌ 1902 को स्वामी विवेकानंद ने अपना देह त्याग दिया। लेकिन उनके विचार सदा से अमर थे, है और आगे भी रहेंगे।


आइये जाने स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक संदेश:-

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